उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (उपमा) के केन्द्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की शंका के आधार पर हिरासत में लेने के प्रकरण में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़ी फटाकर लगाई है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की दो सदस्यीय खंडपीठ ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर सवालिया लगा दिए और कहा कि प्रथम दृष्टया यह गुंडागर्दी जैसा प्रतीत होता है।
अदालत ने साफ कहा कि वह इस मामले को हल्के में नहीं लेगी और सरकार को अपने कदम का ठोस कानूनी आधार बताना होगा।
राज्य सरकार और अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब दाखिल करने के आदेश दिए गए हैं।
यह मामला 19 जुलाई का है जब ध्यानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सोनम वांगचुक के समर्थन में जंतर-मंतर पहुंचने की घोषणा की थी।
इसके बाद ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया इस कार्रवाई को उनके सहयोगी लालमणि ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए से उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान सरकार ने बी एन एस की धारा 172 का तर्क देते हुए हिरासत को उचित ठहराया और कहा कि दिल्ली में निषेधाज्ञा लागू थी।
इस पर उच्च न्यायालय ने तीखा सवाल किया कि दिल्ली में लागू निषेधाज्ञा का उत्तराखंड पुलिस से क्या संबंध है और बंदी ने आखिर किस कानून का उल्लंघन किया है।
अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की छवि जैसे तर्क व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीमित का आधार नहीं बन सकते।
खंडपीठ की तल्ख़ टिप्पणी के बाद यह मामला राज्य सरकार के लिए कानूनी और संवैधानिक चुनौती बनता जा रहा नजर आ रहा है।